नवरात्र में डांडिया केवल नाचने-गाने का आयोजन नहीं है। यह मां दुर्गा की आराधना, आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा उत्सव है। गुजरात की धरती से निकली डांडिया की परंपरा आज देश के कोने-कोने में लोकप्रिय हो चुकी है। नौ दिनों तक मां दुर्गा की उपासना के साथ डांडिया खेलना भक्तों के लिए श्रद्धा और उल्लास का विषय होता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या आज डांडिया के नाम पर आयोजित होने वाले तमाम कार्यक्रम अपनी मूल भावना और मर्यादा को बनाए रख पाए हैं?
जमशेदपुर में डांडिया आयोजनों को लेकर उठे विवाद ने इस सवाल को फिर प्रासंगिक बना दिया है। कुछ आयोजनों में मुस्लिम युवकों के प्रवेश को लेकर विवाद की स्थिति पैदा होने की चर्चा है। ऐसे में जरूरी है कि भावनाओं के उबाल में बहने के बजाय मूल प्रश्न पर विचार किया जाए। डांडिया का आयोजन आखिर किस उद्देश्य से किया जाता है और उसमें शामिल होने वालों से आयोजकों की अपेक्षाएं क्या हैं?
आस्था के उत्सव को उपद्रव का मंच नहीं बनने देना चाहिए। डांडिया की पहचान मां दुर्गा की आराधना, अनुशासन और सांस्कृतिक उल्लास से होनी चाहिए—विवाद, अभद्रता और अव्यवस्था से नहीं।
जमशेदपुर में डांडिया आयोजनों में मुस्लिम युवकों के प्रवेश को लेकर विवाद खड़ा हुआ। कुछ हिंदू संगठनों ने आपत्ति जताई और आधार कार्ड के जरिए उनकी पहचान सुनिश्चित करने की कोशिश की। इस विवाद के बीच एक बुनियादी सवाल पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है—क्या डांडिया और गरबा को केवल मनोरंजन का एक और इवेंट मान लिया जाना चाहिए, या इनके धार्मिक और सांस्कृतिक स्वरूप की रक्षा भी जरूरी है?
यह तर्क भी अपनी जगह विचारणीय है कि जब किसी को वंदे मातरम में मां दुर्गा की आराधना के भाव से आपत्ति होती है, तो फिर देवी आराधना से जुड़े आयोजनों में उसकी भागीदारी का उद्देश्य क्या है? यदि डांडिया में शामिल होने का मकसद केवल मनोरंजन, दिखावा या किसी की धार्मिक भावनाओं को चुनौती देना है, तो यह निश्चित रूप से विचारणीय विषय है। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान मात्र के आधार पर उसके इरादों पर फैसला सुनाना उचित नहीं होगा। असली कसौटी आयोजन का उद्देश्य, उसमें निर्धारित नियम और उसमें शामिल होने वाले व्यक्ति का आचरण होना चाहिए।
जमशेदपुर में यह विवाद गहराया तो मंत्री इरफान अंसारी भी इसमें कूद पड़े। दूसरी ओर विधायक सरयू राय ने भी इस मुद्दे पर टिप्पणी की। सवालों का सिलसिला आगे बढ़ा तो यह तर्क भी सामने आया कि डांडिया में शामिल होने के लिए मुस्लिम युवक ही क्यों आते हैं, वे अपने घर की बहू-बेटियों को लेकर क्यों नहीं आते? इस तरह के सवाल राजनीतिक बहस को हवा दे सकते हैं, लेकिन इनसे मूल समस्या का समाधान नहीं निकलता।
विधायक सरयू राय के सवाल
जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय ने कहा है कि जो लोग अपने परिवार की कन्याओं को नक़ाब हटाकर हिन्दू धर्म के ऐसे आयोजनों में साथ लेकर नहीं आ सकते, उन्हें इसमें भाग लेने की अनुमति नहीं दे सकते, माँ दुर्गा पर खुलकर आस्था नहीं व्यक्त कर सकते, वे आखिऱ हिन्दुत्व और माँ दुर्गा के इस पूजनोत्सव कार्यक्रम में क्यों और किस उद्देश्य से शामिल होना चाहते हैं?
नवरात्र और दुर्गापूजा जैसे पर्वों का अपना धार्मिक महत्व है। लेकिन अब कई जगह एक दिन के डांडिया आयोजन को बड़े व्यावसायिक कार्यक्रम का रूप दिया जा रहा है। होटल, बैंक्वेट हॉल और अन्य स्थानों पर आकर्षक सजावट, तेज संगीत, महंगे टिकट और प्रायोजन के जरिए इसे कमाई का बड़ा माध्यम बनाया जा रहा है। आयोजकों के लिए यह लाखों रुपये के कारोबार का अवसर बन सकता है, लेकिन सवाल यह है कि इस पूरी कवायद में मां दुर्गा की आराधना और धार्मिक परंपरा के लिए कितनी जगह बचती है?
समस्या तब पैदा होती है, जब धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल केवल व्यावसायिक लाभ के लिए होने लगे और आयोजकों के लिए आस्था से अधिक महत्व कमाई का हो जाए। यदि आयोजन में धार्मिक भावना गौण हो जाए और दिखावा प्रधान, तो उसकी मूल भावना पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
डांडिया आयोजनों में पहनावे को लेकर उठ रहे सवाल भी इसी व्यापक बहस का हिस्सा हैं। किसी की पोशाक पर मनमाना फैसला सुनाने के बजाय आयोजकों को पहले से स्पष्ट और मर्यादित ड्रेस कोड निर्धारित करना चाहिए।
इसी संदर्भ में नवरात्र उत्सव और दुर्गापूजा के दौरान फिल्मी गानों पर नृत्य को लेकर मद्रास हाई कोर्ट के फैसले की चर्चा भी प्रासंगिक है। ऐसे मामलों में न्यायालय की टिप्पणी या आदेश का उल्लेख करते समय उसके वास्तविक दायरे और परिस्थितियों को समझना आवश्यक है। लेकिन व्यापक सवाल वही है कि धार्मिक आयोजनों में मनोरंजन की सीमा क्या हो और परंपरा की मर्यादा किस तरह कायम रखी जाए।
एक और विडंबना देखिए। जब धार्मिक आयोजनों की पवित्रता और मर्यादा की बात होती है, तो कुछ लोग तुरंत सांप्रदायिक सौहार्द का सवाल उठाने लगते हैं। गंगा-जमुनी तहजीब की दुहाई दी जाती है और किसी भी आपत्ति को धार्मिक कट्टरता से जोड़ दिया जाता है। लेकिन सांप्रदायिक सौहार्द का अर्थ यह तो नहीं हो सकता कि किसी समुदाय की धार्मिक भावनाओं और परंपराओं की चिंता को ही अनुचित ठहरा दिया जाए।
साथ ही, यह सिद्धांत सभी धर्मों और समुदायों पर समान रूप से लागू होना चाहिए। यदि किसी दूसरे धर्म के आयोजन में कुछ नियम हैं, तो उनका सम्मान किया जाना चाहिए। उसी तरह हिंदू धार्मिक आयोजनों की मर्यादा और परंपराओं का सम्मान भी अपेक्षित है। लेकिन इस सम्मान का आधार किसी समुदाय के प्रति घृणा या संदेह नहीं, बल्कि परस्पर संवेदनशीलता और स्पष्ट नियम होने चाहिए। किसी व्यक्ति को केवल उसकी धार्मिक पहचान के कारण उपद्रवी मान लेना भी उतना ही गलत है, जितना धार्मिक आयोजन की मर्यादा की चिंता करने वालों को बिना सुने सांप्रदायिक करार देना।
आज जरूरत इस बात की है कि धार्मिक आयोजनों के नाम पर होने वाली अव्यवस्था, अश्लीलता, अभद्र व्यवहार और हुड़दंग और लफंगों के प्रवेश पर रोक लगे। डांडिया और गरबा के आयोजकों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कार्यक्रम का उद्देश्य केवल टिकट बेचकर कमाई करना न रह जाए। प्रवेश के नियम पारदर्शी हों, सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम हों, निर्धारित मर्यादा का पालन कराया जाए और किसी भी तरह की अभद्रता या उत्पात को बर्दाश्त न किया जाए। किसी भी प्रतिभागी के खिलाफ कार्रवाई उसके वास्तविक आचरण और नियमों के उल्लंघन के आधार पर होनी चाहिए, न कि केवल उसकी धार्मिक पहचान के आधार पर।
धर्म और संस्कृति के नाम पर होने वाले आयोजनों की पवित्रता बनाए रखने की जिम्मेदारी प्रशासन , आयोजकों और समाज की है। यदि किसी आयोजन में आस्था के बजाय दिखावा, भक्ति के बजाय उच्छृंखलता और संस्कृति के बजाय व्यावसायिक स्वार्थ हावी हो जाए, तो उस पर सवाल उठना ही चाहिए। यदि ऐसे आयोजनों में कोई अनहोनी घटना धर्म को लेकर हो गई तो फिर पूजा के उत्साह में खलल पड़ेगी और मामला बिगड़ते देर नहीं लगेगी। प्रशासन की ओर से जो कागजी घोड़ा दौड़ाया जाता है , जिसमें सोशल मीडिया पर नजर रखने की बात कही जाती है,माहौल को खराब करने वालों को चेताया जाता है तो , प्रशासन को ऐसे डांडिया के आयोजनों में लफंगों के प्रवेश पर भी वैसी ही नजर रखने की जरुरत है।
मां दुर्गा की आराधना के नाम पर आयोजित डांडिया को उसकी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के साथ ही आगे बढऩा चाहिए। इसे न तो सांप्रदायिक राजनीति का अखाड़ा बनाया जाना चाहिए और न ही मनमानी कमाई का माध्यम। जो गलत है, वह गलत है.
डांडिया और गरबा में आस्था के नाम पर हुड़दंग करने वालों, महिलाओं के साथ अभद्रता करने वालों और आयोजन की मर्यादा भंग करने वालों के प्रवेश पर सख्ती से रोक लगनी चाहिए। यही धार्मिक परंपरा का सम्मान है और यही सामाजिक सौहार्द की वास्तविक कसौटी भी।
