कड़वा सच-जमशेदपुर की सियासत पर हिंसा का दाग ,,दो दलों के समर्थकों के बीच पत्थरबाजी और लाठीबाजी ने शहर की पुरानी राजनीतिक तासीर पर खड़े किए सवाल

जमशेदपुर की राजनीति की अपनी एक अलग खासियत रही है। इक्का दुक्का घटनाओं को छोड़ दें, तो शहर में राजनीतिक हिंसा की खबरें अपेक्षाकृत कम ही सुनने को मिलती रही हैं। यहां राजनीतिक दलों और नेताओं के बीच तनातनी की खबरें जरूर आती रही हैं। कई बार नेताओं के समर्थक भी आमने-सामने हुए हैं, लेकिन दो प्रमुख राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के बीच इस तरह की हिंसक भिड़ंत कम ही देखने को मिली है। जिला कांग्रेस मुख्यालय तिलक पुस्तकालय के सामने भाजपा और कांग्रेस समर्थकों के बीच जो कुछ हुआ, उसने शहर की इसी पहचान पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इसकी तासीर को आघात पहुंचाया है।
इससे पहले भी किसी राजनीतिक दल के कार्यालय के सामने दूसरे दल के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किए हैं। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी होते रहे हैं और कई बार माहौल तनावपूर्ण भी हुआ है। लेकिन आम तौर पर बात नारेबाजी, विरोध और आपसी तनातनी तक ही सीमित रही। इस बार ऐसा क्या हुआ कि विरोध प्रदर्शन पत्थरबाजी और लाठीबाजी में बदल गया? आखिर वह कौन-सी परिस्थिति थी, जिसने राजनीतिक असहमति को हिंसक टकराव का रूप दे दिया?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि भाजपा और कांग्रेस से जुड़े अनेक कार्यकर्ताओं के बीच केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का ही रिश्ता नहीं है। दोनों दलों के कई कार्यकर्ताओं ने एक साथ स्कूल-कॉलेज में पढ़ाई की है। सार्वजनिक आयोजनों में उनका मिलना-जुलना होता रहा है और व्यक्तिगत जीवन में भी उनके बीच सौहार्दपूर्ण संबंध रहे हैं। राजनीति के मैदान में वे एक-दूसरे के विरोधी जरूर हैं, लेकिन सामान्य सामाजिक जीवन में उनके बीच दुश्मनी जैसी कोई स्थिति नहीं रही है। फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि एक-दूसरे पर पत्थर बरसने लगे और हाथों में लाठियां उठ गईं?

राहत की बात यह है कि किसी को गंभीर चोट लगने की खबर सामने नहीं आई। लेकिन किसी बड़ी अनहोनी के नहीं होने भर से इस घटना की गंभीरता कम नहीं हो जाती। सवाल यह है कि राजनीतिक विरोध को इस हद तक पहुंचने से रोकने की जिम्मेदारी आखिर किसकी थी?
पहले भी जब इस तरह के हालात पैदा हुए हैं, तो अक्सर यह देखने को मिला है कि बड़े नेताओं के बीच राजनीतिक या व्यक्तिगत तनातनी का खामियाजा उनके समर्थकों को भुगतना पड़ा है। नेताओं के बीच की लड़ाई में कार्यकर्ता चोटिल होते रहे हैं, जबकि नेतृत्व अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन बचाने में जुटा रहता है। कई बार नेता बाद में सामान्य हो जाते हैं, लेकिन उनके समर्थकों के बीच पैदा हुई कटुता लंबे समय तक बनी रहती है।
तिलक पुस्तकालय के सामने हुई घटना इसलिए भी चर्चा का विषय है कि इसमें इस्तेमाल किए गए पत्थरों और डंडों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। क्या विरोध प्रदर्शन के दौरान हालात अचानक बेकाबू हुए या फिर टकराव की आशंका पहले से मौजूद थी? यदि पत्थर और लाठियां पहले से जुटाई गई थीं, तो इसकी जांच होनी चाहिए।

लोकतंत्र में राजनीतिक दलों को विरोध करने, अपनी बात रखने और सरकार या दूसरे दलों की नीतियों पर सवाल उठाने का पूरा अधिकार है। लेकिन विरोध का अधिकार किसी को हिंसा का अधिकार नहीं देता। यदि हर राजनीतिक असहमति का जवाब पत्थर और लाठियों से दिया जाने लगे, तो लोकतांत्रिक संवाद की जगह टकराव ले लेगा। इसका नुकसान किसी एक दल को नहीं, बल्कि पूरे समाज को उठाना पड़ेगा।
भाजपा और कांग्रेस, दोनों दलों के नेतृत्व को इस घटना को केवल अपने-अपने पक्ष के बचाव या दूसरे पक्ष पर आरोप लगाने के अवसर के रूप में नहीं देखना चाहिए। उन्हें अपने कार्यकर्ताओं को यह समझाने की जरूरत है कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और व्यक्तिगत दुश्मनी दो अलग-अलग बातें हैं। पुलिस और प्रशासन की जिम्मेदारी भी है कि घटना की निष्पक्ष जांच हो, दोषियों की पहचान की जाए और कानून के मुताबिक कार्रवाई हो।
जमशेदपुर की अपनी एक अलग तासीर रही है। औद्योगिक शहर होने के साथ-साथ यहां विभिन्न विचारधाराओं, भाषाओं और सामाजिक पृष्ठभूमियों के लोग रहते हैं। राजनीतिक मतभेदों के बावजूद सामाजिक रिश्तों को बनाए रखना इस शहर की पहचान का हिस्सा रहा है। यही वजह है कि तिलक पुस्तकालय के सामने हुई झड़प को महज दो राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के बीच का विवाद मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इस घटना ने शहर की राजनीतिक संस्कृति पर एक दाग जरूर लगाया है। अब यह जिम्मेदारी राजनीतिक दलों की है कि वे इस दाग को और गहरा होने से रोकें। राजनीति में विरोध होना स्वाभाविक है, लेकिन विरोधियों को दुश्मन समझने की प्रवृत्ति किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए खतरनाक है। जमशेदपुर की पहचान राजनीतिक हिंसा से नहीं, बल्कि मतभेदों के बावजूद साथ रहने की संस्कृति से होनी चाहिए।

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