रांची: झारखंड में करम पर्व (कर्मा पूजा) को लेकर चारों ओर खुशी और उल्लास का माहौल है। रांची, खूंटी समेत राज्य के सभी जिलों में ये पर्व पूरी श्रद्धा और धूमधाम से मनाया जा रहा है। मांदर की थाप और पारंपरिक लोकगीतों की गूंज के साथ लोग इस उत्सव में रमे हुए हैं। रांची कॉलेज के दीक्षांत मंडप सहित कई स्थानों पर आयोजित पूर्व संध्या कार्यक्रमों में युवाओं ने नागपुरी, मुंडारी, संताली और खड़िया गीतों पर मनमोहक लोकनृत्य प्रस्तुत किए। ये त्योहार मुख्य रूप से प्रकृति की शक्ति, कृषि समृद्धि, भाई-बहन के पवित्र रिश्ते और गहरी सामुदायिक एकजुटता का प्रतीक है।
क्या है करम पर्व और इसका सांस्कृतिक महत्व
करम पर्व प्रकृति, कृषि और मानव श्रम के परस्पर जुड़ाव का एक सुंदर संगम है। इसमें ‘करम वृक्ष’ को कर्म देवता का प्रतीक मानकर उसकी डाल की विधि-विधान से स्थापना और पूजा की जाती है। इस पर्व में अंकुरित बीज (जावा) नई जिंदगी और उर्वरता का प्रतिनिधित्व करते हैं, वहीं करम की हरी डाल प्रकृति की अपार शक्ति और समृद्धि का संदेश देती है।
पूजा विधि के साथ इससे जुड़ी परंपराओं को जानें
करम पर्व की तैयारियां लगभग एक सप्ताह पहले से ही शुरू हो जाती हैं, जिसमें नदी से लाई गई ताजा रेत में सात प्रकार के अनाज (जौ, मक्का, गेहूं, चावल, चना, कुल्थी और मसूर) बोए जाते हैं।
करम डाल की स्थापना: आंगन या अखाड़े में करम वृक्ष की तीन शाखाएं लगाई जाती हैं, जो त्रिदेवों और तीनों लोकों तथा कालों का प्रतीक मानी जाती हैं।
भाइयों के लिए प्रार्थना: बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए करम राजा की विशेष पूजा और उपवास करती हैं।
फसलों की सुरक्षा: धान के खेतों को कीटों और हानिकारक तत्वों से बचाने के लिए भेलवा की शाखाएं लगाई जाती हैं।
सहिया परंपरा: इस अवसर पर ‘सहिया’ (गहरी दोस्ती) की परंपरा निभाई जाती है, जो पीढ़ियों तक आपसी संबंधों और सामुदायिक एकता को मजबूत रखती है।
करम और धरम की लोक कथा
इस त्योहार से एक प्राचीन पौराणिक कथा जुड़ी है। कथा के अनुसार, करम और धरम नाम के दो भाइयों में विवाद के दौरान करम ने करम वृक्ष की डाल का अनादर कर दिया था, जिससे उनके परिवार पर भारी विपत्तियां आ गईं। अपनी भूल का अहसास होने पर जब उन्होंने करम देवता से क्षमा मांगकर श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना की, तो उनका जीवन पुनः सुख-समृद्धि से भर गया। तभी से करम डाल की पूजा करने की परंपरा चली आ रही है।
प्रकृति के साथ सामाजिक एकता
करम पर्व का सबसे मुख्य संदेश पर्यावरण और वनों का संरक्षण है। पूजा के उपरांत आयोजित होने वाले सामूहिक ‘करम नृत्य’ और लोकगीतों के माध्यम से जीवन के अनुभव, प्रेम और संस्कृति को नई पीढ़ी तक स्थानांतरित किया जाता है। यह पर्व सिखाता है कि जीवन में कर्म के साथ-साथ प्रकृति का सम्मान और आपसी भाईचारा ही सच्ची समृद्धि का आधार है।
