बदलते समय में पत्रकारिता और ‘चमकता आईना’

समय, समाज और व्यवस्था—तीनों निरंतर परिवर्तनशील हैं। मूल्यों में गिरावट, मान्यताओं में बदलाव और तकनीक की तेज़ रफ्तार ने सामाजिक संरचना को गहराई से प्रभावित किया है। इन सबके बीच पत्रकारिता भी अछूती नहीं रही। जिस पत्रकारिता को कभी आज़ादी की लड़ाई का सशक्त हथियार और बाद में राष्ट्र निर्माण की रीढ़ माना गया, आज वही पत्रकारिता कई सवालों और संदेहों के घेरे में है। बावजूद इसके, उसकी प्रासंगिकता और प्रभाव आज भी उतने ही व्यापक हैं।
सोशल मीडिया के इस युग में सूचनाओं की बाढ़ ने सच और भ्रम के बीच की रेखा को धुंधला कर दिया है। हर हाथ में मोबाइल है और हर कोई सूचना प्रसारित कर रहा है। ऐसे दौर में प्रिंट मीडिया की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। आज भी लोग सही, तथ्यपरक और संतुलित विश्लेषण के लिए अख़बारों की ओर देखते हैं। भरोसे का यह रिश्ता पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूंजी है।
इन्हीं चुनौतियों और जि़म्मेदारियों के बीच ‘चमकता आईना’ अपने स्थापना के तीसवेें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। भले ही यह यात्रा औपचारिक रूप से तीस वर्षों की हो, लेकिन इसके पीछे पत्रकारिता का अनुभव सात दशकों से भी अधिक का है। इसके संस्थापक, दिवंगत श्रद्धेय ब्रह्मदेव सिंह शर्मा ने जिन विषम परिस्थितियों में इस अख़बार की नींव रखी थी, वे आज पूरी तरह बदल चुकी हैं।
आजादी के बाद जब देश नव-निर्माण की राह पर था, तब ब्रह्मदेव सिंह शर्मा समाज और व्यवस्था के बीच सेतु बनकर सामने आये। आज भारत विश्व की अग्रणी आर्थिक शक्तियों में शामिल हो चुका है। कलम से कंप्यूटर और फिर मोबाइल तक की यात्रा ने पत्रकारिता के स्वरूप को बदला है। सूचना के स्रोत बढ़े हैं, लेकिन सटीक और विश्वसनीय खबर की आवश्यकता भी उतनी ही बढ़ी है।
एक समय था जब पत्रकार गिने-चुने होते थे और छोटे शहरों से प्रकाशित होने वाले अख़बार सामाजिक चेतना के केंद्र माने जाते थे। क्षेत्रीय पत्रकारिता ने आम आदमी की आवाज़ बनकर सत्ता और व्यवस्था को आईना दिखाया। आज भी यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। ‘चमकता आईना’ ने इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उन मुद्दों को प्रमुखता दी है, जिन्हें अक्सर हाशिये पर छोड़ दिया जाता है।
बदले दौर में छोटे शहर की खबरें भी राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन रही हैं। आज अपनी बात कहने के लिए अनेक मंच उपलब्ध हैं, लेकिन सच को जिम्मेदारी के साथ सामने रखने का दायित्व अब भी पत्रकारिता पर ही है। लोकतंत्र में पत्रकारिता केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि जन-सरोकारों की प्रहरी होती है।
स्थापना दिवस के इस अवसर पर ‘चमकता आईना’ यह संकल्प दोहराता है कि वह निष्पक्षता, निर्भीकता और जनहित के मूल्यों पर अडिग रहेगा। सत्ता हो या व्यवस्था, समाज हो या सिस्टम—सच को उसके पूरे उजाले के साथ सामने लाना ही इसकी पहचान रही है और रहेगी।
यह सफऱ विश्वास का है, संघर्ष का है और जिम्मेदारी का है—और यही ‘चमकता आईना’ की असली ताकत है। ‘चमकता आईना’ ने क्षेत्रीय पत्रकारिता की उस परंपरा को जीवित रखा है, जो आम आदमी की आवाज़ है। स्थापना दिवस पर यह संकल्प दोहराया जाता है कि यह अख़बार निष्पक्षता, निर्भीकता और जनहित के मूल्यों पर अडिग रहेगा।

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